रतीराम श्रीवास, टीकमगढ़। मनरेगा योजना में भ्रष्टाचार और फर्जीवाड़े की शिकायतें अक्सर सामने आती हैं, लेकिन जनपद पंचायत पलेरा क्षेत्र की ग्राम पंचायत स्यावानी का मामला सरकारी रिकॉर्ड और धरातल की हकीकत के बीच बड़े अंतर की ओर इशारा करता है। यहां चतुर कुशवाहा के नाम से स्वीकृत तलैया के लिए सरकारी रिकॉर्ड में 427 मजदूरों द्वारा काम करना दर्शाया गया, कार्य की लागत ₹1,47,612 दर्ज है और मूल्यांकन भी हो गया, लेकिन जिला स्तरीय ऑडिट टीम जब मौके पर पहुंची तो कथित तौर पर तलैया ही नहीं मिली। मामले ने अब पलेरा जनपद पंचायत की कार्यप्रणाली और मनरेगा के तहत होने वाले निर्माण कार्यों की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
26 अप्रैल को स्वीकृति, 27 मई को काम शुरू फिर तलैया गई कहां?
सरकारी अभिलेखों के अनुसार ग्राम पंचायत स्यावानी में मनरेगा के अंतर्गत 26 अप्रैल 2025 को चतुर कुशवाहा के नाम से तलैया स्वीकृत की गई। इसकी लागत ₹1,47,612 बताई गई। दस्तावेजों में 27 मई 2025 से निर्माण कार्य प्रारंभ होना दर्शाया गया।
रिकॉर्ड में यह भी उल्लेख है कि इस कार्य में 427 मजदूरों ने काम किया।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है, अगर 427 मजदूरों ने काम किया तो तलैया जमीन पर कहां है?
ऑडिट टीम पहुंची तो हितग्राही के उड़े होश
जिला स्तर की ऑडिट टीम जब मनरेगा कार्यों की वास्तविकता जांचने धरातल पर पहुंची और तलैया के हितग्राही चतुर कुशवाहा से संपर्क किया तो मामला उलझने के बजाय और गंभीर हो गया। ऑडिट कर्मचारियों ने जब चतुर कुशवाहा को उसके नाम से स्वीकृत कार्य के दस्तावेज दिखाए तो उसके कथित रूप से होश उड़ गए। उसने अधिकारियों के सामने कहा कि उसने कोई तलैया नहीं बनवाई। इसके बाद मौके का निरीक्षण किया गया तो दस्तावेजों में दर्शाए गए निर्माण के अनुरूप तलैया नहीं मिलने की बात सामने आई।
हितग्राही ने प्रशासन से लगाई गुहार “मेरी तलैया खोजो”
मामला सामने आने के बाद चतुर कुशवाहा ने जिला प्रशासन के समक्ष आवेदन देकर पूरे प्रकरण की जांच कराने की मांग की है। उसकी मांग है कि उसके नाम से स्वीकृत और रिकॉर्ड में दर्ज तलैया को प्रशासन धरातल पर खोजे। यह आवेदन अब पूरे मामले की जांच के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया है।
मामला खुला तो रात में मशीन!
सबसे सनसनीखेज आरोप यह है कि जब यह मामला मीडिया के संज्ञान में आया तो कथित तौर पर रात के अंधेरे में मशीन लगाकर पड़ोसी किसान के खेत में खुदाई कर तलैया का आकार तैयार करने का प्रयास किया गया।
यदि यह आरोप जांच में सही पाया जाता है तो यह सवाल बेहद गंभीर होगा कि सरकारी रिकॉर्ड में जिस निर्माण को पहले ही पूरा और मूल्यांकित बताया गया, उसे मीडिया के सामने मामला आने के बाद रातों-रात मशीन से बनाने की जरूरत क्यों पड़ी?
इस पूरे घटनाक्रम की वीडियो रिकॉर्डिंग, मशीन की आवाजाही, मौके की स्थिति और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जांच कराई जाना जरूरी है।
मूल्यांकन अधिकारी की भूमिका भी जांच के घेरे में
मनरेगा कार्यों में निर्माण की वास्तविक स्थिति के आधार पर माप और मूल्यांकन किया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि मौके पर तलैया नहीं थी तो मूल्यांकन किस आधार पर किया गया?
क्या अधिकारी ने वास्तव में मौके पर जाकर माप लिया था?
क्या माप पुस्तिका में दर्ज आंकड़े वास्तविक हैं?
क्या कार्य की जियो-टैग तस्वीरें उपलब्ध हैं?
क्या उन तस्वीरों की तारीख और लोकेशन की तकनीकी जांच हुई?
इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकते हैं।
“कागजों में विकास” का आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि ग्राम पंचायत क्षेत्र में मनरेगा के कई निर्माण कार्यों को लेकर इसी तरह की चर्चाएं हैं। उनका कहना है कि कुछ कार्य कागजों में पूरे हो जाते हैं, जबकि जमीन पर उनकी वास्तविक स्थिति अलग दिखाई देती है।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी बाकी है, लेकिन स्यावानी की तलैया का मामला सामने आने के बाद पंचायत में हुए अन्य मनरेगा कार्यों की भी जांच की मांग जोर पकड़ने लगी है।
सीईओ की भूमिका पर भी सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि मामला सामने आने के बाद जनपद पंचायत पलेरा के मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा पूरे प्रकरण को गंभीरता से लेने के बजाय मामले को सीमित जांच में निपटाने और लीपापोती करने का प्रयास किया जा रहा है। इन आरोपों की भी स्वतंत्र जांच आवश्यक है। यदि अधिकारी दोषी नहीं हैं तो दस्तावेजों और तकनीकी जांच के आधार पर उनकी भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए।
जांच हुई तो खुल सकता है बड़ा राज
यदि प्रशासन निष्पक्ष तरीके से जांच करे तो इस एक तलैया के मामले से कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं। जांच में मस्टर रोल, मजदूरों के बैंक खातों में भुगतान, माप पुस्तिका, तकनीकी स्वीकृति, जियो-टैग फोटो, कार्य प्रारंभ एवं पूर्णता की तारीख, मूल्यांकन रिपोर्ट और मौके की वर्तमान स्थिति का मिलान किया जाना चाहिए।
साथ ही यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि 427 मजदूर वास्तव में कौन थे और उन्होंने कितने दिन काम किया।
सबसे बड़ा सवाल: 427 मजदूरों ने जिस तलैया में काम किया, वह तलैया गई कहां?
मनरेगा ग्रामीण गरीबों को रोजगार देने और गांवों में स्थायी परिसंपत्तियां बनाने की महत्वपूर्ण योजना है। यदि किसी कार्य में कागजों पर मजदूरों की संख्या, खर्च और मूल्यांकन दर्ज हो जाए, लेकिन धरातल पर निर्माण ही न मिले, तो यह केवल एक पंचायत का मामला नहीं बल्कि योजना की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल है।
अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस मामले में सिर्फ कागजी जांच करता है या दस्तावेजों के साथ जमीन की भी ईमानदारी से जांच कराकर जिम्मेदारी तय करता है।

