एंबुलेंस से कम नहीं ई-अटेंडेंस
लॉगिन, लॉगआउट के बीच फंसी शिक्षक की नौकरी,
जब बनाना था लेसन प्लान तब कर रहे थे नेटवर्क की तलाश!
जब करना था सिलेबस कंप्लीट तो टेंशन थी लॉगिन की,
जब लिखनी थी टीचर्स डायरी तो टेंशन थी लॉगआउट की!
कब कौन से पीरियड में कौन सी क्लास में जाना है से ज्यादा
टेंशन हो गई है ऑनलाइन अटेंडेंस की
सिलेबस हुआ या नहीं!
होमवर्क हुआ या नहीं!
कॉपी चेक हुई या नहीं!
से ज्यादा जरूरी सवाल है
अटेंडेंस लगी या नहीं!
कोई मुंडेर पर तो कोई पेड़ पर
तलाश रहा नेटवर्क है!
जिन शिक्षकों को अपनी काबिलियत दिखानी थी क्लास में,
वे सारे प्रयास दिखा रहे "हमारे शिक्षक एप" में,
और अभी यहीं पर कहानी खत्म नहीं होगी,
अब "हमारे शिक्षक" दिखेंगे अपने साथ अपने विद्यार्थियों की अटेंडेंस लगाने की तलाश में......!

