भार्या, भाई, मित्र साथ में, अमन शांति भी लाये॥
लौटे राम अवध में जब, मन रही थी दिवाली।
भरी हुयी थी आँखें उनकी, मन पूरा था खाली॥
हे राम, कैसी रही दिवाली
खुश थी जनता, खुश थे लोग, खुश थे लोग लुगई।
झूम-झूम कर नाच-गा कर दे रहे थे सभी बधाई॥
राम लौट कर आये तो क्या पहले ऐसी थी राजधानी।
महल द्वार पर आई माँ का भी अब महारानी॥
भरा हुआ था कनक थाल फिर भी मन था खाली॥
हे राम, कैसी रही दिवाली
राम गये श्री, अनुज सहित, तब माथे पर था हाथ पिता का।
लौट कर आये समर जीत कर साथ नहीं था बस पिता का॥
जीत कर आये सारी दुनियाँ लेकिन राम हुए अनाथ।
क्या पाया, क्या जीता राम ने, राम हुए रघुनाथ॥
पाकर पाया क्या, रोकर खोया क्या प्रश्न आज बड़ा है।
राज द्वार से भीतर आये कनक सिंहासन था खाली।
हे राम, कैसी रही दिवाली
कृष शरीर, मन भरा हुआ था, भरत के अंदर ज्वार भरा था।
उमड़-उमड़ कर राघव को देखे फिर भी मौन खड़ा था॥
राम-भरत के बचपन की स्मृति, क्या खाये कहाँ खेले।
राम, भरत के साथ अकेले, पीछे खड़े थे रेले॥
दोनों की आँखें थीं भारी, मन बहुत था खाली।
हे राम, कैसी रही दिवाली
कनक महल में शोर हो रहा, राघव आज हैं आये।
उछल-कूद थी मची हुई, राजमहल के राजा आये॥
सूर्यवंश का सूर्य आज सिंहासन की ओर चलेगा।
मंत्री, संत्री, जाचक, जनता, राज-राजमहल से होगा॥
भरत लौट कर आये, देखो नंदीग्राम था खाली।
हे राम, कैसी रही दिवाली
कवि: मनमोहन शर्मा।

