Shri Ganesh Ji Ki Katha - श्री गणेश जी की कथा

Updesh Awasthee
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भारत में भगवान श्री गणेश को प्रथम पूज्य देवता माना गया है। भगवान श्री गणेश को विघ्नहर्ता माना जाता है, जो मनुष्य के जीवन की सभी बडो को नष्ट कर देते हैं। किसी भी प्रकार की शुभ कार्य में और किसी भी प्रकार की पूजा पाठ में सबसे पहले भगवान श्री गणेश की पूजा की जाती है। बुधवार को भगवान श्री गणेश के लिए व्रत रखा जाता है और भगवान श्री गणेश की कथा का वाचन एवं श्रवण किया जाता है। यहां पर आपके लिए भगवान श्री गणेश की कथा प्रस्तुत की गई है:- 

Shri Ganesh Ji Ki Katha: The Divine Story Behind Lord Ganesha's Worship

एक बार माता पार्वती ने ब्रह्मांड के सबसे दिव्य पुत्र की कामना से तपस्या प्रारंभ कर दी। जब उनका यज्ञ पूर्ण हुआ तो वह शक्ति जो ब्रह्मांड का संचालन करती है, जिसको कोई देख नहीं सकता, द्विज का रूप धारण करके माता पार्वती के द्वार पर पहुंचे। माता पार्वती ने उन्हें अतिथि जानकर यथाशक्ति सेवा सत्कार किया। माता पार्वती की सेवा से प्रसन्न होकर वरदान दिया कि, हे मां आपकी मनोकामना अभी और इसी समय पूरी होगी। आपको बिना गर्भधारण के एक पुत्र की प्राप्ति होगी और वह ब्रह्मांड में सबसे अधिक बुद्धिमान होगा। वह सभी गण का नायक होगा और देवताओं में प्रथम पूज्य होगा। ऐसा कहकर द्विज रूप अंतर्ध्यान हो गए और पलना पर एक बालक प्रकट हो गया। 

बालक का रूप और तेज पूरे ब्रह्मांड में सबसे अनूठा था। यह देखकर माता गौरी अत्यंत प्रसन्न हुई और कैलाश पर मंगल गान प्रारंभ हो गए, सभी देवता आदि पुष्प की वर्षा करने लगे। भगवान शिव और माता पार्वती ऐसे दिव्य पुत्र की प्राप्ति पर बड़े ही प्रसन्न हुए और दान इत्यादि करने लगे। कैलाश पर चारों ओर आनंद छा गया। माता पार्वती के पुत्र के दर्शन हेतु तीनों लोकों के देवता आदि कैलाश आने लगे। देवताओं में शनि देव भी आए लेकिन वह अपने विशेष गुण के कारण बालक के दर्शन करने को संकोच करने लगे। तब माता पार्वती ने शनिदेव से पूछा कि क्या आपको मेरा उत्सव अच्छा नहीं लगा। क्या आप मेरे पुत्र के लिए प्रसन्न नहीं है। शनिदेव ने संकोच करते हुए कहा कि मां चारों ओर आनंद है, मैं उत्सव में उपस्थित हूं, लेकिन बालक के दर्शन करने के लिए संकोच करता हूं। माता पार्वती ने शनिदेव के वचनों पर ध्यान नहीं दिया और बालक के दर्शन करने के लिए उन्हें आमंत्रित किया। जैसे ही शनिदेव की दृष्टि बालक के ऊपर पड़ी, बालक का सर आकाश में उड़ गया। 

एक क्षण में, आनंद समाप्त हो गया और कैलाश पर हाहाकार मच गया। कहा जाने लगा कि शनिदेव ने माता पार्वती के पुत्र का नाश कर दिया है। यह समाचार सुनते ही कैलाश पर उपस्थित भगवान श्री हरि विष्णु अपने वाहन गरुड़ पर सवार होकर उत्तर दिशा की ओर गए और जो पहला नवजात शिशु (गज पुत्र) दिखाई दिया, उसका सिर लेकर आ गए। भगवान श्री हरि विष्णु ने बालक के धड़ के ऊपर गज शिर को रखा और भगवान शंकर ने प्राण मंत्र पढ़कर बालक को पुनः जीवित कर दिया। तब भगवान शिव ने बालक का नाम गणेश रखा और आशीर्वाद दिया कि यह बालक ब्रह्मांड का सबसे बुद्धिमान बालक होगा एवं देवताओं में प्रथम पूज्य होगा। 

एक बार भगवान शिव ने भगवान श्री गणेश की बुद्धि की परीक्षा का आयोजन किया। उन्होंने कैलाश पर घोषणा करी की जो भी पृथ्वी की प्रतिष्ठा करके सबसे पहले वापस आएगा वही इस परीक्षा का विजेता होगा। भगवान श्री गणेश समझ गए, उन्होंने बुध्दिबल का प्रयोग किया और अपने माता-पिता के चरणों की सात प्रदक्षिणा पूरी कर दी। यह देखकर भगवान श्री गणेश अत्यंत प्रसन्न हुए और एक बार फिर उन्हें प्रथम पूज्य का वरदान दिया। 

इस प्रकार जो भक्त पूर्ण श्रद्धा और ध्यान लगाकर श्री गणेश कथा एवं चालीसा का पाठ करता है, उसके घर में प्रतिदिन नए-नए मंगल कार्य (शुभ काम) होते हैं और उसे संसार में मान-सम्मान की प्राप्ति होती है।

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